Wednesday, July 13, 2011

मुंडन और अन्नप्राशन


धीरे-धीरे रुनझुन पूरे छ: महीने की हो गयी... अब तक तो वो बस दूध ही पीती थी लेकिन अब समय आ गया था जब बड़ों जैसा तरह-तरह का स्वादिष्ट खाना वो भी खा सके... और इसीलिए बेटी का अन्नप्राशन संस्कार करने का निश्चय किया गया... शुभ दिन, शुभ मुहूर्त देखकर दादू ने तिथि निश्चित की... प्रतिमा मौसी ने खुद अपने हाथों से निमंत्रण पत्र बनाया जिसमें बिटिया की फोटो भी थी... और निमंत्रण... वो तो खुद बिटिया की ही ओर से था...  आप सब तो उस समय बेटी की खुशियों में शामिल नहीं हो पाए थे इसलिए चलिए आज हम वो सारी बातें आप से शेयर करते हैं ताकि आप भी जुड़ सकें बेटी की खुशियों से...
ये है वो निमंत्रण पत्र... सुन्दर है न!
और ये रहा निमंत्रण... इसे पूरा पढ़ियेगा ज़रूर!  
अन्नप्राशन का दिन निश्चित हुआ 17 मई 2002 का... फिर क्या था... एक बार फिर बेटी की छुकछुक गाड़ी चल पड़ी रांची.. दादा-दादी के पास जहाँ उसे बहुत मज़ा आने वाला था... और छुकछुक गाड़ी का सफ़र तो रुनझुन को पसंद है ही... 
                 
                      
इस बार जब रुनझुन रांची पहुंची तो उसे वहां पहले से भी ज़्यादा लोग मिले इसलिए उसे वहां और भी अच्छा लगा...
ताई जी और मम्मी के साथ खिलखिलाती रुनझुन 
वहां जाकर रुनझुन को पता चला कि उसका मुंडन संस्कार भी होने वाला है... यानि उसके सिर पर रेशम जैसे नर्म, मुलायम और चमकीले नन्हे-नन्हे जो बाल हैं वो अब नहीं रहेंगे... बिटिया परेशान!... अब क्या होगा... वो तो टकलू हो जाएगी... लेकिन फिर मम्मी ने बताया कि एक बार मुंडन हो जाने के बाद उसके और भी सुन्दर बाल आ जायेंगे फिर क्या था बिटिया खुश...
  17 मई को सुबह-सुबह ताई जी ने सबसे पहले तुलसी माँ को प्रणाम करवाया...
अरे ! ज़रा संभलकर ! फूलों से भी नाज़ुक है लाडो 
और फिर मुंडन शुरू हुआ... बिटिया बिना डरे बिलकुल तैयार बैठी थी... बहुत ही आराम और प्यार के साथ बेटी ने अंकल को अपने बाल निकालने दिए... ज़रा भी नहीं रोई क्योंकि उसे तो पता था कि अब उसके और भी सुन्दर-सुन्दर और लम्बे बाल आ जायेंगे तो रोना क्यों ? देखिये बेटी ने कैसे ख़ुशी-खुशी अपना मुंडन करवाया...  
 
अरे देखो मैं तो बिलकुल टकलू हो गयी ही-ही-ही
उसके बाद पूरे शरीर पर हल्दी लगाकर बिटिया को नहलाया गया...
नहीं हल्दी लगाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा!
और फिर नहा-धोकर बिटिया रानी तैयार...



        
अब तो बस बेटी को जोर से भूख लग रही थी और उसे पता था आज उसे कोई नई चीज़ खाने को मिलने वाली है इसलिए भूख और भी ज़ोरों से लग गई थी... बस फिर क्या था प्रशांत मामा ने लाडो को गोद में लेकर सबसे पहले टेस्टी-टेस्टी खीर खिलाई, फिर पानी भी पिलाया... ये देखिये...
   
 उसके बाद एक और मज़ेदार रस्म हुई... सारी दीदियों को रुनझुन का पैर दबाना था... ऐसा क्यों हुआ ये तो रुनझुन को नहीं पता लेकिन जब दीदी पैर दबा रही थी तब उसे बहुत शर्म आयी...दीदी लोगों को भी नन्हीं सी गुड़िया के नाज़ुक कोमल-कोमल पैरों को दबाते हुए बहुत हंसी आ रही थी...
अरे-अरे!.. दीदी!! ये क्या कर रही हैं!!!
और इस तरह रुनझुन के खीर खा लेने के साथ ही दिन कि सारी रस्में ख़त्म हो गईं... अब बारी थी रात की पार्टी की और उसके लिए सबको तैयार भी होना था... सबसे पहले बेटी तैयार हो गई क्योंकि उसे सारे मेहमानों को अटेंड भी तो करना था न...और तैयार होने के बाद सबसे पहले तो बेटी ने घर के ही सारे लोगों को अटेंड किया उनकी गोद में जा-जाकर... देखिये तो ज़रा...
दादी के साथ रुनझुन 
रानी दीदी छोटी बहना के साथ 
मम्मी की नन्ही परी
और फिर क्या... धीरे-धीरे घर मेहमानों से भर गया और बेटी बहुत-बहुत बिज़ी हो गयी... आप तो जानते ही हैं गेस्ट के आ जाने पर होस्ट को तो फुर्सत ही नहीं मिलती...और हमारी नन्ही सी गुड़िया तो मेन होस्ट थी न!... तो फिर उसकी व्यस्तता तो आप समझ ही सकते हैं...         

1 comment:

  1. प्रिय रुनझुन इतनी ख़ुशी मस्ती देख तो मेरा भी मन करने लगा की मुंडन करा ही लूं काशी जा के बच्चा बन जाऊं लेकिन हमें तो मिठाई देने की जगह पकड के बाबा जी बना देंगे -
    सुन्दर छवियाँ आंनंद दायी
    आभार
    शुक्ल भ्रमर५

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