Friday, July 8, 2011

नानी और बेटी...




अप्रैल 2002.... रुनझुन अब पूरे पाँच महीने की हो चुकी थी... अब तक वो बनारस में थी नानी के घर... लेकिन अब उसे नानी को छोड़ पापा के पास मुज़फ्फरपुर जाना था.... अब रुनझुन क्या करे?... एक तरफ पापा के पास जाने की ख़ुशी तो दूसरी तरफ नाना-नानी, मामा-मौसी सबसे दूर जाने का दुःख... रुनझुन समझ नहीं पा रही थी  क्या करे... इसलिए वो बहुत ही उदास थी... और अपनी लाडो के दूर जाने की कल्पना से नानी भी बहुत दुखी थीं... तो फिर हम सबने इसका एक समाधान निकाला और नानी ने भी साथ जाने का निश्चय कर लिया... फिर क्या था नानी भी खुश नतिनी भी खुश... चल पड़ी रुनझुन अपने जीवन की दूसरी रेलयात्रा पर नानी और मम्मी के साथ...

मेरी नानी सबसे प्यारी 
एक्सरसाइज़ तो नियम से रोज़ाना होनी चाहिए ना... तो फिर क्या फ़र्क पड़ता है कि वो घर हो या ट्रेन... देखिये रुनझुन ने ट्रेन में भी अपना योगाभ्यास जारी रखा....

ना-ना- हंसिये नहीं... आप भी रोज़ एक्सरसाइज़ कीजिये! 

पहले से रुनझुन अब थोड़ा ज़्यादा समझदार हो गई थी, इसलिए ट्रेन की खिड़की से बाहर तेज़ी से भागती चीजों को देखने में उसे बहुत मज़ा आया... शाम तक रुनझुन पापा के पास मुज़फ्फरपुर पहुँच गई... वहाँ  पापा प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े बेसब्री से बेटी का इंतज़ार करते मिले... और रुनझुन पापा के साथ घर की ओर चल दी... नए घर में पूरी तरह एडजस्ट हो जाने के बाद हमने रुनझुन और नानी के डे-आउट का प्रोग्राम बनाया... सुबह-सुबह नानी ने लाडो को नहलाया,  तैयार किया और रुनझुन खुश होकर घूमने चल दी... आप भी देखिये.. घूमने जाने के नाम पर बेटी की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था....

नानी! गंगे-गंगे हो गया अब जल्दी से कपड़े पहनाइए.. उधर चलिए..

ओहो! नानी प्लीज़ ! देर मत कीजिये ना..

अरे! क्या मैं ऐसे जाउंगी ?

अरे नहीं! वो देखिये मम्मी कपड़े लेकर आ रही है...

चलिए पापा अब मैं बिलकुल तैयार हूँ ...

गाड़ी में तो मुझे नानी के पास ही बैठना है.. नानी मुझे खिड़की से बाहर भी तो दिखाएंगी न...

और फाइनली रुनझुन जा पहुँची ऐतिहासिक स्थल वैशाली...  जहां रुनझुन ने खूब सारी नई-नई चीज़ें देखी... और खूब इंजॉय किया... वैसे भी रुनझुन घूमने की बहुत शौकीन है... धूमने में वो खाना-पीना सब भूल जाती है... तो आइये आपको भी  दिखाते हैं रुनझुन ने क्या-क्या देखा... सबसे पहले वो पहुँची विश्व शांति स्तूप देखने...  

ये देखिये हम पहुँच गए विश्व शान्ति स्तूप के पास...

ये रहा विश्व शांति स्तूप... बहुत सुन्दर है ना...

थोड़ा और पास से देखिये ...कित्ता सुन्दर ... एकदम दूध जैसा सफ़ेद है न...

और ये देखिये शेर... बड़ाsssss सा... लेकिन मैं तो बिलकुल  नहीं डरी

और ये हम आ गए स्तूप के ऊपर... वाह ! यहाँ कितनी तेज़ हवा चल रही है...

ये है बड़ेsssss से  भगवान बुद्ध.. बिलकुल सोने जैसे रंग के..

बाप रे! बुद्ध भगवान कित्ते बड़े फूल के अन्दर बैठे है न...

अरे! भगवान जी तो सो गए!!! कोई बात नहीं अब हम कुछ और देखेंगे...

 हम आ गए अशोक स्तम्भ देखने..

ये देखिये पुराने खँडहर और वो लम्म्म्म्म्बा सा पिलर  अशोक स्तम्भ है...

मैं ज़रा इन पर बैठ कर देखूँ !! नहीं बाबा डांट पड़ेगी चलो यहाँ से... 

और इसके बाद हमने लिच्छवियों का रेलिक स्तूप भी देखा..

वाह-वाह! यहाँ बैठ कर तो बहुत मज़ा आ रहा है... लेकिन ये क्या???? गाड़ी तो चल ही नहीं रही है.... 

जी हाँ! इतना-सब घूमते-घूमते रात होने लगी, हम घर लौटने की तैयारी करने लगे लेकिन बेटी गाड़ी में बैठने को तैयार ही नहीं... हम सब परेशान... क्या करें... आखिरकार उन्हें कुछ देर गाड़ी के बोनट पर बैठा दिया गया, अचानक बिटिया रानी को न जाने क्या सूझी और वो  एकदम से गाड़ी में बैठने को तैयार हो गई... और फिर हमने वापसी का सफ़र शुरू किया....
  

9 comments:

  1. सुंदर चित्र, बहुत ही उम्दा प्रस्तुती

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  2. बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर..

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  3. सुन्दर प्रस्तुति बाल और नानी माँ के भावों की .वैशाई की सैर बे मिसाल .

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  4. प्रिय रुनझुन जी बहुत सुन्दर छवियाँ और आप की मीठी बातें मजा आ गया कुछ वर्ष पहले हम भी इसी विश्व शांति स्तूप और इन जगहों पर घूमते थे जब हम हजारीबाग कोडरमा नवादा पटना में रहा करते थे यादें ताजा कराने के लिए ढेर सारा प्यार -आप के साथ आप के प्यारे दुलारे परिवार को भी
    .आओ बाल झरोखा में भी घूमो ,http://surenrashuklabhramar5satyam.blogspot.com
    शुक्ल भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

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  5. सवाई सिंह राजपुरोहित, वीरुभाई, सुरेन्द्र शुक्ला अंकल और चैतन्य आप सभी ने मेरे बारे में पढ़ा और पसंद किया... इसलिये आप सभी को ढेर सारा थैंक्यू!!!

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  6. प्यारी रुनझुन हम भी मन से बच्चे हैं आप सब के लिए जीते हैं लिखते हैं हँसते हैं
    बहुत ही अच्छा लगा आप इतनी शीघ्र बाल झरोखा सत्यम की दुनिया में आई
    जरुर घूमिये घुमक्कड़ी बनिए पर खूब पढ़िए शुभ कामनाएं

    बच्चों के ब्लॉग का बहुत सा लिंक है यहाँ देखना लिंक लगे हैं अंतरजाल है

    शुभ कामनाएं -आती रहना

    शुक्ल भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया
    भ्रमर की माधुरी कारण और निवारण

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  7. इन तस्वीरों को देख कर बहुत अच्छा लगा. मेरी नानी का घर भी मुजफ्फरपुर में ही है और मैं हर गर्मी की छुट्टियों में वहां जाता हूँ. अभी कुछ दिनों पहले ही मैं भी वैशाली घूमने गया था. मैं वहां नाव भी चलाया था. आपकी तस्वीरों को देख कर लगा की जितना मज़ा मुझे आया होगा आपको भी जरूर आया होगा.

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