Saturday, September 3, 2011

एक नन्ही परी...



देखते ही देखते कब और कैसे रुनझुन अपनी उम्र के दूसरे पड़ाव पर पहुँच गयी पता ही नहीं चला | 7 नवंबर 2003...रुनझुन ने अपने जन्म की ये दूसरी वर्षगाँठ बड़ी ही सादगी और प्यार के साथ मनाई... बस...

मम्मी-पापा और बेटी

अपनी प्यारी सी बेटी के इस खास दिन को मम्मी-पापा ने बड़े ही खास तरीके से मनाया था... पूरा दिन सिर्फ और सिर्फ बेटी के नाम... 
इस दिन मम्मी ने वो गाना रुनझुन को विशेष रूप से सुनाया जो मम्मी को बहुत पसंद था और इस गाने को रुनझुन के जन्म के बाद मम्मी अस्पताल में ही सुनने को व्याकुल हो गयी थी... अब रुनझुन इस गाने के भावों को समझ सकती थी इसलिए इसे सुन वो भी बहुत खुश हुई... इस गाने का हर एक शब्द मानों बेटी के लिए ही लिखा गया था... 


आइये आज आप सब के साथ-साथ हम उन प्यारे लम्हों की सुहानी यादों से गुज़रतें हैं.... 

मेरे घर आयी एक नन्ही परी 

चाँदनी के हसीन रथ पे सवार..

उसकी बातों  में शहद जैसी मिठास 

उसकी सांसों में इतर की महक आए


होठ जैसे कि भीगे-भीगे गुलाब 

गाल जैसे की दहके-दहके अनार 

उसके आने से मेरे आँगन में खिल उठे फूल, गुनगुनाई बहार 

देखकर उसको जी नहीं भरता


 चाहे देखूँ उसे हजारों बार
मैंने पूछा उसे कि कौन है तू

हँस के बोली कि मैं हूँ तेरा प्यार 

मैं तेरे दिल में थी हमेशा से

घर में आई हूँ आज पहली बार  






Sunday, August 28, 2011

दादी अम्मा...





रुनझुन को शुरू से ही हम सब दादी अम्मा बुलाते थे... नन्ही सी बच्ची लेकिन बातें बड़ी-बड़ी, हर काम बहुत ही संभाल के, बेहद सलीके और संजीदगी के साथ करती | सफाई पसंद इतनी की कुछ भी खाते या पीते वक़्त रुमाल हाथ में रखना पड़ता, ज़रा भी मुँह में लगना या गिरना नहीं चाहिए, बिना सैंडल या चप्पल के पाँव ज़मीं पर न रखती | यही नहीं किसी भी चीज़ से डरना तो वो जानती ही नहीं थी सिवा चोट के... जहाँ भी उसे गिरने का खतरा नज़र आता, वहाँ क़दम ही न बढ़ाती और इसीलिए उसे चोट भी बहुत कम लगती और अगर कभी हलकी सी खरोच आ ही जाती तो फिर "चोट-चोट" कहकर दिन-भर हर किसी को दिखाती फिरती, लेकिन इन सबसे उसकी स्फूर्ति में कहीं कोई कमी नहीं आती, पूरी सावधानी के साथ वो अपनी कलाबाजियों में पूरी तरह संलग्न रहती... 

ये देखिये रुनझुन की फेवरेट जगह 

अब तो बेटी को इसपर चढ़ना भी आ गया था 

ये है सबके साथ बराबरी में बैठने के लिए किया गया जुगाड़ 

हमउम्र अनिकेत मामा को प्यारा सा अप्पा 

और अब कुछ कलाबाजियाँ!

सब-कुछ उल्टा-पुल्टा!!! 

"कॉकरोच!" रुनझुन की जिज्ञासा का बहुत बड़ा विषय 

और ये देखिये दीवार पर छिपकली ने कॉकरोच को पकड़ लिया... रुनझुन इस दृश्य को अंत तक बहुत ही विस्मय और दुख के साथ देखती रही...

अरे ये क्या! ... पर्स लेकर बेटी तो चली शॉपिंग करने ...

पर अब आगे कैसे बढ़े!...आगे तो सीढ़ी है!!!

भला अब क्या हुआ! बेटी ने ऐसा क्या देख लिया!!! 

अब इतने अरसे बाद ये बात तो हमें भी याद नहीं, हम तो बस बेटी के आज के साथ उसके कल को भी इस ब्लॉग के माध्यम से साथ-साथ जिए जा रहे हैं...  

Friday, August 26, 2011

दिल्ली की सैर...




रुनझुन तब मात्र एक साल की थी जब लगभग पूरे भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ी थी, कई वर्षों का रिकार्ड भी टूटा था,  इस भीषण ठण्ड से बचने के लिए रुनझुन को प्याज के छिलके की तरह परत दर परत इतने कपड़े पहनाये जाते कि दुबली पतली रुनझुन एकदम गोल-मटोल हो जाती...

नन्ही  Eskimo बुआ नानी के साथ 

गोल-मटोल....मोटू सेठ!

लेकिन ये गुब्बारा तो और भी ज्यादा मोटू है...ही-ही-ही..

Smile please!!!!!!

इसके साथ ही अलाव जलाकर घर को गर्म रखने की कोशिश भी की जाती लेकिन ये सब परेशानी तो मम्मी पापा की थी , बिटिया रानी तो हर हाल में मस्त....



इसी बीच ठंड और कुहरे की चादर लपेटे नया वर्ष भी आ गया और इयर के बर्थडे में केक तो कटना ही था....  

Very-Very Happy New Year!!!

अरे नहीं-नहीं डरिये नहीं इतनी ठण्ड में ये आइसक्रीम नहीं रबड़ी है...

सर्दी हो या गर्मी... रुनझुन का Favorite Sleeping Mode!! 

इतना ही नहीं इसी ठण्ड में रुनझुन दिल्ली भ्रमण पर भी निकल पड़ी देखिये कुछ तस्वीरें कड़कड़ाती, ठिठुरती सर्दी में रुनझुन के दिल्ली भ्रमण की......

सर्दी की मस्ती !!!

पहचाना इसे, ये है दिल्ली का लाल किला 

ये रहा कुतुबमीनार... बाप रे! कित्ताsssssss ऊँचा!!!!!

ये है धुँध में लिपटा Lotus Temple... साथ में अमित भैया और आयुष  मामा 

और अब इसे देखिये दिल्ली का छतरपुर मंदिर 

बता सकते है ये रुनझुन के पीछे क्या है...?

इसे तो आप जानते ही हैं... हाथी!...बड़ाsssss सा !!! 

अब इसे पहचानिए, नहीं समझे, अरे! ये है एक बड़ाsssss सा कछुआ !



Tuesday, August 23, 2011

तेरे रूप अनेक तू एक ही है...



      कुछ तकनीकी परेशानी की वजह से "रुनझुन की बातों" में एक अल्पविराम आ गया था, लेकिन अब सब ठीक है और उम्मीद है कि बातों का ये सिलसिला बिना किसी बाधा के, निरंतरता के साथ आगे जारी रहेगा...कल ही हमने माखन चोर नन्द किशोर का जन्मोत्सव मनाया है इसलिए उन्ही के वंदन और आशीर्वाद के साथ आज की ये पोस्ट उसी नटखट कन्हैया को समर्पित है....

                
                     2003 की श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन नटखट कन्हैया ग्वाल-बालों संग हमारे घर पधारे थे... नहीं विश्वास होता न !..... तो चलिए आप खुद ही उनसे मिल लीजिये...

मुरली बजैय्या...कृष्ण कन्हैया!!!

नटखट नन्द किशोर

करत ठिठोली..संग हमजोली 

नार नवेली... राधा अलबेली !!! 

अच्छी नहीं कान्हा ये तेरी अठखेली...

फोड़ दियो तूने मोरी माखन की मटकी 


और ये रहे...


गोपी और ग्वाल 

आधुनिक पालकी पे सवार...

डाले हाथों में हाथ... चले कान्हा के पास 

तो देखा न आपने...अब तो विश्वास हो गया न...? जी हाँ, ये है हमारी-आपकी, हम सबकी "रुनझुन" कभी नटखट कन्हैया... कभी राधा रानी तो कभी ब्रज की गोरी... हाँ साथ में ग्वाल बने हैं रुनझुन के छोटे से अनिकेत मामा...कैसी लगी बिटिया की ये पावन छवियाँ......?

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