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Monday, September 19, 2011

बूझो तो कौन....


इन्हें पहचानते हैं... क्या कहा कभी देखा नहीं..? अरे नहीं..नहीं...ज़रा गौर से देखिये आप इन्हें बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं... जी हाँ बिलकुल सही कहा...ये वही हैं अपनी नटखट नन्ही गुड़िया "रुनझुन".... अब सोचने वाली बात ये है की इनका ऐसा हाल कैसे हो गया... तो भई ये रुनझुन की शरारतों का एक छोटा सा नमूना है... घर में रंग-रोगन का काम चल रहा था और रुनझुन को बड़ी ही आसानी से नील का पूरा भरा हुआ एक बड़ा सा डिब्बा मिल गया... तो बस उसका उपयोग कुछ यूँ किया गया... मम्मी को पता चला तो काफी नाराज़ होकर वहाँ पहुंची लेकिन बिटिया रानी की हालत देखकर हंसी आ गयी और पहले उनकी इस छवि को कैमरे में कैद कर लिया गया....

इतना ही नहीं रुनझुन शांत रहकर चुपचाप ऐसी अनोखी शरारतें अक्सर किया करती थी, कहीं भी कोने में छुपकर कुछ न कुछ ऐसा ही रचनात्मक काम अक्सर हुआ करता था.... एक बानगी और भी देखिये... पापा के मैपिंग स्टिकर का कितना सुन्दर उपयोग हुआ है... जब पापा अचानक वहाँ पहुंचे तो डर गयी कि अब तो डांट पड़ने वाली है...... लेकिन अब इतनी भोली सूरत देखकर भला गुस्सा किसे आता..?...पापा को हंसी आ गयी और बस बेटी  को लगा कि उसने कोई तीर मार लिया है...वो भी खुश हो गई....




लेकिन हाँ, ऐसा नही है कि रुनझुन सिर्फ शरारतें ही करती थी बल्कि यूँ ही खेल-खेल में सबकी नक़ल करते-करते, सबको देखते-देखते बहुत कुछ बड़ी ही तेज़ी से सीखती भी जा रही थी... तो आइये रुनझुन की नक़ल की इस अकल को भी ज़रा परखते हैं....

पापा के साथ डिसकशन
(अखबार की खबरों पर) 


और बता सकते हैं यहाँ नीचे क्या हो रहा है.... नहीं..?.... ज़रा गौर से देखिये.... जी हाँ! रुनझुन बिटिया बुआ नानी और गुड़िया मौसी के साथ मेडिटेशन कर रही हैं.....

ओssssssमssssssssssssssssss!!!!!!


चलिए ये तो रही नक़ल की बात लेकिन हमारी बिटिया रानी को पढ़ाई का भी इन दिनों कुछ ज्यादा ही शौक हो गया था, किताबों और कापियों के साथ भी अब इनकी दोस्ती हो गयी थी... और पढ़ने की स्टाइल... अरे भई एक दम नायाब... देखिये ज़रा आप भी गौर फरमाइए....

अरे हाँ! किताब की ओर ध्यान मत दीजिएगा  

क्यों! कुछ याद आया..?.... अरे हम सब भी तो कभी-कभी कुछ खाते हुए पढ़ते या फिर पढ़ते वक्त यूँ ही कुछ खाते हैं न...?... तो फिर बेटी किसी से कम थोड़े ही न है...


हाँ, किताब उल्टी है तो क्या हुआ... 
चित्र तो कैसे भी देखा जा सकता है....


पढ़ने के साथ-साथ अब लिखने की भी शुरुआत हो चुकी थी... और ये काम भी बड़ी ही लगन और तन्मयता के साथ होता.... 'round-round circle' तो खूब सारा और सुन्दर-सुन्दर बनता ही, कभी-कभी 'Triangle' भी बन जाता और कभी-कभी तो सचमुच जादू हो जाता जब बेटी के हाथों 'A' बन जाता और वो बिलकुल "यूरेका-यूरेका" वाली स्टाइल में उछलती-कूदती, खुश होती..."मम्मीssss देखो! मैंने 'A' लिख लियाssssss मैंने 'A' लिख लियाssss....."   




कापी, किताब, पेन और पेन्सिल के अलावा और भी दूसरे माध्यमों के साथ रुनझुन कुछ न कुछ सीख रही थी... ये देखिये.... की बोर्ड और माउस के साथ यहाँ क्या हो रहा है....

एनिमेटेड गणेश पूजा 

और अब कुछ गीत-संगीत भी....


 म्यूजिकल ABC


तो देखा आपने व्यावहारिकता के साथ ही दृश्य-श्रव्य माध्यमों का भी भरपूर इस्तेमाल कर रुनझुन सतत सीखने की प्रक्रिया में किस तरह संलग्न है.... उसकी यही सीखने की प्रक्रिया और रचनात्मकता आज तक निर्बाध गति से यूँ ही चल रही है... 

Monday, September 5, 2011

प्यारी सी गुड़िया...




 बड़ी-बड़ी, गोल-गोल आँखों वाली भोली सी रुनझुन...

ममता की छाँव में...!


 मीठी मुस्कानों वाली मासूम गुड़िया... अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी...

Barbie Doll in her Cabinet...!!!

अब वो नन्ही सी गुड़िया खुद गुड़ियों से खेलने लगी थी...

Doll with doll...!!!

अगर आपने उसकी गुड़िया माँगी तो... देखिये वो कैसे अपनी गुड़िया के साथ भाग खड़ी होती...

भागोss!...छोटी मौसी गुड़िया लेने आ रही है...
(क्योंकि ये छोटी मौसी की गुड़िया है...ही-ही-ही) 


हाँ, बाल्टी का रोल ज़रूर थोड़ा बदल गया...

अब ये छुपने के काम आने लगी...


पहले केक पसंद नहीं था, और अब... केक दिख गया तो ले के भाग खड़ी होती...

मुझे पूरा केक खाना है...

रीझती-रिझाती, हँसती-हँसाती इस मासूम कली का सरस्वती पूजा के दिन विद्यारम्भ संस्कार हुआ...

ये पूजा पंडाल भईया लोगों ने बनाया है... अच्छा है न!!!


 दादू ने पूजा कराई... स्लेट पर स्वस्तिक बनवाकर और ओम लिखवाकर रुनझुन की पढ़ाई का शुभारम्भ करवाया...

पहले स्वस्तिक!

और फिर ओम!!!


धीरे-धीरे रुनझुन ने नयी-नयी कलाएँ भी सीखनी शुरू कर दी... आइये! एक झलक इधर भी देखिये, क्या-क्या नए-नए गुर सीखे बिटिया रानी ने....



अब ये लीजिए! इन्हें इस मेमने के साथ खेलना है...

कुछ मिमिक्री भी हो जाये!!!

मस्ती! पीयूष मामा और शुभम के साथ

और अब थोड़ा डांस भी..!!!

ये देखिये बिटिया ने साईकिल भी चला ली...
वो भी बड़ी वाली...हा-हा-हा!!!

Sunday, August 28, 2011

दादी अम्मा...





रुनझुन को शुरू से ही हम सब दादी अम्मा बुलाते थे... नन्ही सी बच्ची लेकिन बातें बड़ी-बड़ी, हर काम बहुत ही संभाल के, बेहद सलीके और संजीदगी के साथ करती | सफाई पसंद इतनी की कुछ भी खाते या पीते वक़्त रुमाल हाथ में रखना पड़ता, ज़रा भी मुँह में लगना या गिरना नहीं चाहिए, बिना सैंडल या चप्पल के पाँव ज़मीं पर न रखती | यही नहीं किसी भी चीज़ से डरना तो वो जानती ही नहीं थी सिवा चोट के... जहाँ भी उसे गिरने का खतरा नज़र आता, वहाँ क़दम ही न बढ़ाती और इसीलिए उसे चोट भी बहुत कम लगती और अगर कभी हलकी सी खरोच आ ही जाती तो फिर "चोट-चोट" कहकर दिन-भर हर किसी को दिखाती फिरती, लेकिन इन सबसे उसकी स्फूर्ति में कहीं कोई कमी नहीं आती, पूरी सावधानी के साथ वो अपनी कलाबाजियों में पूरी तरह संलग्न रहती... 

ये देखिये रुनझुन की फेवरेट जगह 

अब तो बेटी को इसपर चढ़ना भी आ गया था 

ये है सबके साथ बराबरी में बैठने के लिए किया गया जुगाड़ 

हमउम्र अनिकेत मामा को प्यारा सा अप्पा 

और अब कुछ कलाबाजियाँ!

सब-कुछ उल्टा-पुल्टा!!! 

"कॉकरोच!" रुनझुन की जिज्ञासा का बहुत बड़ा विषय 

और ये देखिये दीवार पर छिपकली ने कॉकरोच को पकड़ लिया... रुनझुन इस दृश्य को अंत तक बहुत ही विस्मय और दुख के साथ देखती रही...

अरे ये क्या! ... पर्स लेकर बेटी तो चली शॉपिंग करने ...

पर अब आगे कैसे बढ़े!...आगे तो सीढ़ी है!!!

भला अब क्या हुआ! बेटी ने ऐसा क्या देख लिया!!! 

अब इतने अरसे बाद ये बात तो हमें भी याद नहीं, हम तो बस बेटी के आज के साथ उसके कल को भी इस ब्लॉग के माध्यम से साथ-साथ जिए जा रहे हैं...  

Tuesday, July 26, 2011

कुछ नन्ही मासूम बातें...



रुनझुन और नानी एक-दूसरे को बहुत याद कर रहे थे... और रुनझुन को उनसे मिलने जाना था... इसलिए एकबार फिर रुनझुन की छुकछुक गाड़ी तैयार हो गयी... इस बार सफ़र में प्रतिमा मौसी भी साथ थी... और इसबार ट्रेन में रुनझुन की मस्ती का अंदाज़ भी अलग ही था...
 सफ़र के लिए बिलकुल तैयार !
येsssss... आ गई ट्रेन के अन्दर !
अपर बर्थ पर मस्ती शुरू...
तेजी से भागते दृश्यों पे टकटकी...
और अब, नानी के पास पहुँच कर रुनझुन की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था...  रुनझुन को नानी का छोटा सा गार्डेन बहुत पसंद आया और सबसे पहले उसने वहाँ के सारे पौधों से दोस्ती कर ली...
देखा दोस्ती का फायदा! दोस्त की एक उँगली.. यानि पत्ती ने कैसे सहारा दिया..
भई, ये जगह तो बेटी को भा गयी !
फिर तो वहाँ घुस कर भी देखना ही था 
अरे! ये देखो!...पार भी निकल गई!!! 
और फिर कुछ मस्ती बूआ नानी के साथ भी हुई...
ना-ना!.. डरने की बात नहीं है... ये तो बहादुर बच्ची है! 
ये हैं नानी और बूआ नानी 
                   
बेटी कहाँ है... खोजो तो ज़रा!
एक नज़र इधर भी.....
याहूssss! पानी में मस्ती!!! 
लो भई, हो गया गंगे-गंगे!
देखो-देखो! कोमल मौसी चलना सीख रही है!...ही-ही-ही... 
और अब बेटी चली घूमने...
....मम्मी, नानी और कोमल मौसी के साथ...
जा पहुँची विश्वनाथ मंदिर (B.H.U.) के अन्दर 
वहाँ पर नंदी से भी मुलाकात हुई!!! 
              

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