Tuesday, June 19, 2012

हरे जनाब...


आइये आज मैं आप सबकी मुलाक़ात एक हरे जनाब से करवाती हूँ.... अरे!अरे! चौंकिये मत! मेरा मतलब किसी हरे रंग के आदमी से नहीं बल्कि हरे-हरे पक्षी मिठ्ठू तोते से है... क्या सोच रहे हैं आप...? यही न कि अचानक ये हरे जनाब कहाँ से आ गए !!!.... Let me tell you from the starting....


हमारे बनारस पहुँचने के तीन दिन पहले एक हरा तोता हमारी छत पर जाने कहाँ से उड़ते-उड़ते आ गया...  नानी ने छत पर उसे देखा तो सोचा कि अन्य पक्षियों की तरह वो भी कहीं से उड़कर आ गया होगा अपने आप चला जायेगा और वो छत से नीचे आ गईं... अगले ही पल उन्होंने देखा कि वो तोता भी उनके साथ नीचे आ गया है... फिर क्या ?... मिठ्ठू मियाँ ने तो हमारे घर को अपना ही अड्डा समझ लिया... दिन भर अलग-अलग तरीकों से सबका मनोरंजन करने लगे... कभी मिठ्ठू-मिठ्ठू की सुरीली पुकार लगाते तो कभी जोरदार सीटी बजाते... यही नहीं जब सब डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे तो मिठ्ठू मियाँ भी आकर टेबल पर विराजमान हो गए और सबके साथ उन्होंने भी वहीं बैठकर खाना खाया... रात को भी वे घर में ही सोये और जब अगली सुबह नानी पूजा करने बैठीं तो ये "हरे जनाब" अचानक उनके सिर पर आकर बैठ गए... ऐसे ही दिन भर तरह-तरह की अजीबोगरीब आवाज़ें निकालते रहते और पूरे घर में इधर से उधर डोलते रहते....

यूँ ही देखते-देखते तीन दिन बीत गए... मिठ्ठू मियाँ तो हमारे घर में ही जम गए... जाने का नाम ही नहीं ले रहे थे.... लेकिन अब हरे जनाब घर में जहाँ-तहाँ गन्दगी फैलाने लगे... वो नानी की रसोई में भी पहुँचने लग गए  कोई भी चीज़ जूठी करके फेक देते... अब तक जनाब घर को कुछ-कुछ पहचानने लग गए थे इसलिए वे थोड़ा-थोड़ा उड़ कर आँगन से रसोई और फिर दूसरे कमरों में भी जाने लगे... इससे एक परेशानी उत्पन्न हो गई... इतनी गरमी में तो हर कमरे में पंखा चलता है.... इसलिए एक तो उन्हें चोट लग जाने का डर था और दूसरी तरफ़ ये जनाब बिजली के तारों को अपनी चोंच से पकड़-पकड़ कर उतरने-चढ़ने लगे जिससे उन्हें करेंट लग जाने का भी खतरा था तो फिर नानी ने सोचा कि अब जब प्यारे मिठ्ठू जी हमारे घर को छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं तो फिर क्यों न उन्हें पूरी तरह से हमारे ही परिवार का सदस्य बना लें ?.... परिणाम स्वरूप घर के अन्य सदस्यों की तरह उन्हें भी एक कमरा दे दिया गया.... मिठ्ठू राम को किस प्रकार का कमरा मिला होगा उसका अंदाज़ा तो आपको हो ही गया होगा... जी हाँ !!!... ये है मिठ्ठू मियाँ का "Mini Cage"


ये देखिये.....
मिठ्ठू मियाँ अपने कमरे का निरीक्षण कर रहे हैं


इनके रूम के अंदर इनके अंदाज़ तो देखिये... बिल्कुल स्टार जैसे... लगता है कि इन्हें पिंजड़े में नहीं बल्कि स्टेज पर खड़ा कर दिया गया है...

ह्म्म्म कमरा तो अच्छा है... मैं खुश हुआ..!!!


बर्तनों को देख अब मुझे भूख लग गयी है..
खाना खा के आपसे मिलूँगा...
है न हमारे मिठ्ठू मियाँ कमाल के !!!......

वैसे आप सबको पता है? इन मिठ्ठू मियाँ को देखकर मैंने एक कविता भी लिखी... आइये आप सबको दिखाऊं:

जीव है ये हरा-हरा
बतलाओ तो तुम ज़रा
 कौन हैं ये हरे जनाब?
 दिनभर रटते मिठ्ठू-राम |
लाल रंग की चोंच है इनकी
छोटे-छोटे पाँव हैं |
मानव जैसी वाणी इनकी
हरी मिर्च से प्यार है |
नक़ल करने में नंबर-वन
कलाबाजी है हॉबी इनकी |
रोज नहाते,खूब हैं खाते
हम सबके ये मिठ्ठू राम || 



कैसी लगी मेरी कविता ?..... मुझे ज़रूर बताइयेगा.... 


ओ.के फ़्रेंड्स! अब मैं चलती हूँ... जल्दी ही फिर मिलूँगी...तब तक के लिए बाय-बाय... 








Monday, June 18, 2012

Father's Day

हेलो फ्रेंड्स!!
कैसे हैं आप सब??... मेरी गर्मी की छुट्टियाँ अब समाप्त हो गयी... हम वाराणसी से 14 जून, 2012 को चल कर 16 जून को वापस गाँधीधाम आ गए... आज मेरे स्कूल का छुट्टियों के बाद पहला दिन था.. मुझे बहुत मज़ा आया... इन छुट्टियों की बहुत सारी बातें आपसे शेयर करनी है लेकिन सबसे पहले मैं कल की बातें करना चाहती हूँ....जी हाँ कल यानि 17 जून, 2012 जो एक बहुत ही खास दिन था... आपको भी तो पता है न कि कल था... पितृ-दिवस.. मतलब ''फ़ादर्स डे'' (Father's Day)... तो फ्रेंड्स, किसी भी इवेंट के पहले हम सब क्या करते हैं....?.... जी हाँ.... उसके बारे में जानते हैं.... तो आइये कुछ जाने फ़ादर्स डे के बारे में...

''फ़ादर्स डे'' के दिन मैं सुबह टी.वी देख रही थी तभी मैंने एक कहानी पढ़ी तो सोचा कि आप सब से भी शेयर कर लूँ...
फ़ादर्स डे कैसे शुरू हुआ?
बहुत साल पहले यू.एस.ए. में ''सोनारा डोड'' नामक एक लड़की रहती थी.. उसकी माँ का निधन हो गया था और वो अपने पापा और 5 भाइयों के साथ रहती थी.. एक दिन रविवार को वो अपने पापा के साथ चर्च गयी और वहाँ पर उसे ''मदर्स डे'' के बारे में पता चला.... और तब उसने सोचा कि यदि मदर्स डे होता है तो एक दिन हमारे पिताओं को भी समर्पित होना चाहिए... उसने फ़ादर्स डे मनवाने का दृढ़ निश्चय कर लिया और एक औपचारिक पत्र भी भेजा... आखिरकार सन 1923 में फ़ादर्स डे को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया... येsssss.....!!! थैंक्यू ''सोनारा डोड'' अगर आप ने फ़ादर्स डे मनाने का दृढ़ निश्चय नहीं किया होता तो आज हमारे पिताओं को एक भी दिन समर्पित नहीं होता...

अब चलिए मैं आपको दिखाती हूँ कि मैंने अपना फ़ादर्स डे कैसे मनाया...
मैंने अपने पापा को एक प्यारा सा कार्ड दिया प्यारे से मैसेज के साथ... 


Dear Father,
You are a great soul.
You always serve us
Your love, care and
many more things
which can't be written...
Your hands are always on me
and when I need them
You give me frequently....

Your ears are always open
to hear our secrets,
and some nonsense
which we whisper in.
Sometimes you go impatient
and punish us too
to make us a great person
like you !!!

'O' Papa,
you are wonderful...
we're gonna love
and obey you...

Have a wonderful day !
Keep smiling !!! 


भाई ने भी पापा को अपने हाथों से बना कार्ड दिया....


है ना बहुत ही प्यारा सा कार्ड !!!


और सचमुच पापा बहुत-बहुत खुश हुए उन्होंने प्यार से हमें गले लगा लिया....


My father is my Hero !!!
He is really Great !!!







Friday, June 8, 2012

Hello Varanasi

हेलो फ्रेंड्स!!!
I am back after a long time!!!!
आप सबको तो पता ही होगा कि मेरे ग्रीष्म अवकाश चल रहे हैं...  
नहीं? तो चलिए मैं आप सबको अभी बता देती हूँ...

4 मई '12 से मेरे ग्रीष्म अवकाश शुरू हो गए थे और फिर 6 मई की ट्रेन से हम (मैं, माँ, पापा और भाई) दिल्ली आ गये (गांधीधाम से वाराणसी डाइरेक्ट रिज़र्वेशन नहीं था)| और वहाँ प्रशांत मामा हम सब का इंतज़ार कर रहे थे... हमारे स्टेशन पहुँचते ही उन्होंने हम सबको रिसीव किया...लेकिन दिल्ली से बनारस की ट्रेन में तो पाँच घंटे बाक़ी थे और हम सब के पेट में चूहे कूदने लगे...इसलिए हम सब दिल्ली के एक रेस्टुरेंट में गए- पिंड बलूची ....फ्रेंड्स! पता है... मैं आप सबके साथ वहाँ के कुछ फ़ोटोज़ शेयर करना चाहती थी...पर कुछ प्रॉब्लम की वजह से नहीं कर पाई...कोई बात नहीं, तब-तक आप मरे वहाँ के वर्णन से ही काम चला लीजिए...

आहा!! भूखे पेट में जब खाना गया तो आराम मिल गया....ह्म्म्म, अब तो हमारी ट्रेन का समय हो गया है....बाय-बाय दिल्ली...अब मैं चली बनारस- मेरे नाना- नानी के घर....कुछ ही देर बाद ट्रेन आ गई और हम उसमे सवार  हो गए..रात को आराम से सोने के बाद हम पहुँच गए बनारस (वाराणसी)!!!


अब आप सब सोच रहे होंगे कि यदि मैं 8 मई को ही बनारस पहुँच गई थी तो आप सब से मेरी इतने दिनों तक बात कैसे नहीं हो पाई? क्या बताऊँ फ्रेंड्स! बनारस में लाईट की काफी प्रॉब्लम है इसलिए मैं आप लोगों से बातें नहीं कर पाई...और अब मेरी छोटी-सी बहना (मेरे प्रशांत मामा की बेटी) बड़ी हो गयी है इसलिए मेरा ज़्यादा समय उसी के साथ बीत जाता है..अरे-अरे आप ये मत समझिए कि छुट्टियों में मैं सिर्फ अपना समय खेलने में ही बिताती हूँ...मैं पढ़ाई भी करती हूँ....वैसे, I am Sorry!!! लेकिन अब तो मैं वापस आ गई हूँ...बातों का पिटारा लेकर....तो चलिए शुरू करें...


दोस्तों क्या अप सब को याद है कि 13 मई को क्या था? जी हाँ अपने ठीक समझा..13 मई को था मदर्स डे (Mother's Day) यानी हमारी प्यारी- प्यारी माओं का दिन!!! और ऐसे में मैं अपनी माँ को कुछ गिफ़्ट कैसे न देती ? आइये आपको दिखाऊँ कि मैंने अपनी प्यारी -प्यारी माँ को क्या गिफ़्ट किया....








तो फ्रेंड्स कैसा लगा आपको मेरी माँ के लिए ये गिफ़्ट? ये थे वो तीन पेज, जिस पर मैंने अपनी प्यारी माँ के लिए अपने हाथों से लिखी थी ये कविता....मैं अपनी माँ के बारे में जो भी सोचती हूँ उसे यहाँ लिख दिया...क्या आप सब भी अपनी माओं के लिए यही सोचते हैं? मेरी माँ ही मेरी सब-कुछ हैं और उन्हें ये बताने के लिए मेरी टूटी-फूटी भाषा में ये थी मेरी एक कोशिश.....


अच्छा फ्रेंड्स अब मैं चलती हूँ वर्ना ''Electricity'' बहना दोबारा चली जाएँगी..:) और हाँ! आप सब भी मुझे बताइयेगा कि आप सबने मदर्स डे पर अपनी माँ के लिए क्या किया...O.K? और हाँ आज के लिए एक प्रॉमिस- नेक्स्ट टाइम आपसे जल्दी मिलूंगी..


बाय-बाय!!!

Friday, April 27, 2012

बाल साहित्यकार डा.श्रीप्रसाद नानाजी से एक मुलाक़ात...


हेलो फ्रेंड्स ! 

मेरी गर्मी की छुट्टियाँ बस कुछ ही दिनों में शुरू होने वाली हैं... मैं तो बहुत excited हूँ... गर्मी की छुट्टियाँ मतलब रुटीन से एकदम अलग हटकर... लगभग एक महीने तक बिलकुल अलग दिनचर्या... बिलकुल अलग तरह की मस्ती... मैं तो मार्च का महीना आते ही गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार शुरू कर देती हूँ... अ-अ-अ-अ लेकिन इस साल की छुट्टियाँ तो अभी हुई नहीं... कोई बात नहीं चलिए आपको पिछले साल की गर्मी की छुट्टियों के बारे में बताती हूँ... 

हमेशा की तरह पिछली बार भी गर्मी की छुट्टियों में मैं अपनी नानी के घर बनारस गई थी और मेरी छुट्टियों का ज़्यादातर समय तरह-तरह की किताबें पढ़ने, ड्राइंग करने या फिर अपनी छोटी बहना (मेरे मामा की बेटी) के साथ खेलने में बिताती थी... मम्मी ने मेरे लिए ढेर सारी बुक्स खरीदी थीं... उन्ही बुक्स में से एक कहानियों का संकलन था--"दादी का पंचतंत्र" और इन कहानियों के लेखक हैं- डा0 श्रीप्रसाद... इनकी कविता "हल्लम-हल्लम हौदा हाथी" मैं बचपन में बड़े चाव से सुना करती थी... एक दिन जब मैं ये किताब पढ़ रही थी, तभी प्रतिमा मौसी ने मुझे बताया कि अगर मैं चाहूँ तो मैं श्रीप्रसाद नाना जी से मिल सकती हूँ... ये बात पता चलते ही मैं तो खुशी से झूम उठी... अगले दिन हम श्रीप्रसाद नाना जी के घर गए... उन्हें देखकर तो मैं आश्चर्य में पड़ गई कि नाना जी इतने बड़े होने के बाद भी हम बच्चों के लिए कविताएँ और कहानियाँ कैसे लिख लेते हैं क्योंकि वो सब कविताएँ और कहानियाँ तो बिलकुल हम बच्चों जैसी ही होती हैं.... और आपको पता है... नाना जी ने हमें अपनी प्रकाशित कई पुस्तकें दिखाईं उन सभी की कविताएँ और कहानियाँ बहुत ही अच्छी थीं... बिलकुल हम बच्चों के लिए... नाना जी ने हमें अपनी मिनी लाइब्रेरी भी दिखाई... उनके लिखने का स्थान जहाँ बैठकर वो इतना सुन्दर बाल साहित्य लिखते हैं वो जगह भी हमें दिखाई... वो भी हमसे मिलकर बहुत खुश हुए... उन्होंने मुझसे खूब सारी बातें की... और उन्होंने अपनी कई कविताएँ खुद गाकर मुझे सुनाईं... सबसे पहले उन्होंने मेरी फेवरेट कविता सुनाई.... कौन सी ????.... आप खुद ही देख लीजिए....


हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम|
हम बैठे हाथी पर, हाथी हल्लम-हल्लम||

लंबी-लंबी सूँड, फटाफट फट्टर-फट्टर|
लंबे-लंबे दाँत, खटाखट खट्टर-खट्टर||

भारी-भारी मूँड, मटकता झम्मम-झम्मम| 

हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम||

पर्वत जैसी देह, थुलथुली थल्लल-थल्लल|
हालर-हालर देह हिले जब हाथी चल्लल||

खम्भे जैसे पाँव धपाधप, पड़ते धम्मम|
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम||


हाथी जैसी नहीं सवारी अग्गड़-बग्गड़|
पीलवान पुच्छ्न बैठा है बाँधे पग्गड़||

बैठे बच्चे बीस, सभी हम डग्गम-डग्गम|
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम||


दिन भर घूमेंगे हाथी पर, हल्लर-हल्लर|
हाथी दादा ज़रा नाच दो थल्लर-थल्लर||

अरे नहीं हम गिर जायेंगे, घम्मम-घम्मम|
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम||

---डा0 श्रीप्रसाद  

वैसे तो ये कविता मैंने बचपन से ही बहुत बार धीरज मामा के मुँह से सुनी है और मुझे थोड़ी-थोड़ी याद भी है लेकिन श्री प्रसाद नानाजी के मुँह से सुनने में और भी ज़्यादा मज़ा आया... इसके अलावा उन्होंने और भी कई कविताएँ सुनाईं... इतना ही नहीं किस घटना से प्रेरित होकर कौन सी कविता बनी या फिर कौन सी कविता उनके बचपन के किसी संस्मरण से जुड़ी है... ऐसी बहुत सी बातें... कविताओं और कहानियों के पीछे की ढेर सारी कहानियाँ भी उन्होंने हमें सुनाईं... उनसे ये सारी बातें करना बहुत ही रोचक लग रहा था... मैं तो उनकी बातों में खो गयी थी... मन कर रहा था बस यूँ ही ढेर सारी बातें करती जाऊँ लेकिन उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी और डॉक्टर ने उन्हें ज़्यादा बोलने के लिए मना किया था... नानी जी (उनकी पत्नी) बीच-बीच में उनको याद दिलाती और थोड़ा आराम करने को कह रही थी... अब-तक धीरे-धीरे रात होने लगी थी और हमें वापस भी जाना था... चलने से पहले मैंने नानाजी को एक पेन गिफ़्ट की जो मैं स्पेशियली उनके लिए ले गयी थी... वो बहुत खुश हुए... उन्होंने मुझे खूब सारा आशीर्वाद दिया और कहा कि-- "अगली बार जब बनारस आना तो अपनी लिखी चीज़े भी साथ ले आना और मुझे दिखाना", मैं इस बार भी जब वहाँ जाऊंगी तो उनसे ज़रूर मिलूँगी... लेकिन हाँ इस बार वहाँ जाने पर बहुत दुःख भी होगा क्योंकि इस बीच नानी जी (उनकी पत्नी) गुज़र गयीं... घर में उनकी कमी बहुत खलेगी... पिछली बार वो भी पूरे समय हम लोगों के साथ थीं और हमारी हर बात-चीत में पूरी तरह से शामिल थीं... इतना ही नहीं लाख मना करने पर भी उन्होंने बड़े प्यार से हमें नाश्ता कराया था... ये सब याद करके मुझे बहुत दुःख भी होता है और सोचती हूँ कि जब सिर्फ़ एक बार मिलकर ही मुझे इस समाचार से इतना दुःख हो रहा है तो नानाजी को कैसा लग रहा होगा... वो तो कितने सालों से उनके साथ ही थीं...  आज उनकी बातें करते हुए, उन्हें याद कर, मुझे बहुत खराब लग रहा है... इसलिए अब चलती हूँ... बाद में फिर मिलूँगी मूड ठीक होने के बाद... तब-तक आप देखिये ये कुछ फोटोग्राफ्स उस मुलाकात की.....

डा. श्रीप्रसाद नानाजी और मैं !!!
   
 अद्भुत गौरव के पल !!!


 नानाजी, नानीजी और मम्मी के साथ


प्रतिमा मौसी और नानाजी के साथ खुशी के पल

नानाजी की मज़ेदार कविताओं का रसास्वादन


ये देखिये, बच्चों की कविताएँ पढ़ते हुए बच्चों जैसे ही मगन नानाजी


नानाजी की बातों में खोई मैं


नानाजी के साथ सलीम मामा और मैं


नानाजी से मिलकर, उनसे प्यारी-प्यारी बातें करके अभिभूत मैं









Sunday, April 22, 2012

आज है पृथ्वी दिवस



हाँ, आज पृथ्वी दिवस (Earth Day) है... और हर जगह आज इसकी चर्चा भी है... किसी भी स्पेशल दिन पर हम उससे सम्बंधित बातें तो बहुत ढेर सारी करतें हैं लेकिन फिर अगले ही दिन हम सब-कुछ भूल जाते हैं... तभी तो हमारी पृथ्वी दिनों-दिन अपना सौंदर्य खोती जा रही है... लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि अब तो हम बच्चे भी जागरूक हो रहे हैं... अब हमें भी पता है कि हमारी पृथ्वी को हरा-भरा स्वस्थ और सुन्दर बनाये रखने के लिए हमें पर्यावरण-प्रदूषण को रोकना है, पानी के दुरुपयोग को रोकना है, पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों की रक्षा करनी है... हम इसके लिए पूरा प्रयास करेंगे और वो दिन दूर नहीं जब हमारी छोटी-छोटी कोशिशें रंग लायेंगी और हमारी ये ख़ूबसूरत धरती और भी निखर उठेगी...  


To save our Mother Land, 
I also lend my hand... 


पेड़ लगाओ, वृक्ष उगाओ |
धरती माँ को स्वस्थ बनाओ ||


तो आज के इस स्पेशल दिन चलिए मैं आपको एक ऐसी दुनिया में ले चलती हूँ... जो मुझे उतनी ही पसंद है जितनी अपनी पृथ्वी... और ये है मेरे रंगों की इन्द्रधनुषी दुनिया... इस दुनिया में आपको चारों तरफ सुन्दर, चमकीले ढेर सारे रंग ही रंग दिखाई देंगे... बिलकुल वैसे ही जैसे हमारी सुन्दर धरती पर चारों तरफ सुन्दर-सुन्दर रंग बिखरे हैं...... मैं एक एक करके इन सारे रंगों से आपको मिलवाऊँगी.... लेकिन सबसे पहले आइये आपको दिखाती हूँ वो रंग जिसने मुझे मेरी लाइफ का पहला पुरस्कार दिलाकर मुझे बहुत बड़ी खुशी दी थी... और सबसे बड़ी बात ये है कि ये भी हमारी धरती से ही रिलेटेड है... लेकिन रुकिए....मुझे उससे पहले आपको और कुछ भी बताना है....


ये तब की बात है जब मैं यू.के.जी. की वार्षिक परीक्षाएँ देकर खाली ही हुई थी एक दिन मैंने पेपर में एक advertisement देखा... "बिहार राज्य पर्यावरण प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड" की ओर से "On spot drawing competition" होने वाला था। मैंने मम्मी-पापा को वो ऐड दिखाया और मेरा नाम मम्मी-पापा ने रजिस्टर करवा दिया....टॉपिक था- रंग बिरंगे फूल, पहाड़, और तितलियाँ आदि....बस फिर किस बात कि देर थी?...शुरू हो गयी मेरी फर्स्ट ड्राइंग कम्पटीशन की तैयारी... आखिरकार कम्पटीशन का दिन आ गया...और मैं पेपर में लिखे पते पर पापा के साथ चल पड़ी....बाप रे!!! वहाँ तो इतने सारे लोग थे.... मैं इतने सारे लोगों का मुकाबला कैसे कर पाउंगी?.....
लेकिन मन में अगर हम कुछ करने की ठान लें तो हमें कोई नहीं रोक सकता..है ना फ्रेंड्स?


सबसे पहले हम जिस जगह पर गए वह एक बड़ा-सा मैदान था और हमें उसी मैदान में बैठकर ही ड्राइंग बनानी थी... हमें एक-एक बड़ी सी ड्राइंग शीट दे दी गई... मैंने अभी अपनी ड्राइंग बनानी शुरू ही की थी कि तभी बारिश शुरू हो गई!!!... इन्द्र भगवान की वर्षा से हम बच्चों की सारी Drawings खराब हो गयीं थीं पर इंद्र भगवान ने अगर गड़बड़ की थी तो उन्होंने ही सब ठीक भी कर दिया और हमारे कम्पटीशन को पोस्टपोन  नहीं होने दिया... वहाँ से हम सब ''बिहार राज्य पर्यावरण प्रदूषण कण्ट्रोल बोर्ड'' के ऑफिस में गए और वहाँ पर अपनी Drawings को कन्टीन्यू किया...

फिर शुरू हो गई मेरी गर्मी की छुट्टियाँ.....मैं मम्मी और भाई के साथ अपने नानी के घर बनारस चल दी..और पापा पटना में ही थे... कुछ ही दिनों बाद उन्हें एक फ़ोन कॉल आया कि आपकी बेटी, प्रांजलि दीप ''बिहार राज्य पर्यावरण प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड'' कम्पटीशन में सेकेंड आई है!!!! पापा ने फ़ोन करके मुझे बताया... मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं इतनी अच्छी ड्राइंग करती हूँ!!!... मैं बहुत-बहुत खुश हुई... 


ये रही मेरी सेकेण्ड प्राइज़ विनिंग ड्राइंग और विजेता कप.....


Second Prize
Save Trees... Save Environment


और अगले वर्ष फिर "बिहार राज्य पर्यावरण प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड" के द्वारा ये प्रतियोगिता आयोजित की गयी... इस बार मेरी कैटिगरी के लिए विषय था... "हमारी पृथ्वी"  मुझे लगा कि सिर्फ़ हरी-भरी और पानी वाली पृथ्वी तो सभी बनायेंगे लेकिन मुझे भविष्य की पृथ्वी से सबका परिचय करवाना चाहिये... दोस्तों! आप सब तो ये जानते ही होंगे कि यदि हम पृथ्वी के गहनों यानी वृक्षों को काटते हैं तो हम हमारी पृथ्वी को भी हानि पहुंचाते हैं... तो मैंने भी अपनी ड्राइंग के द्वारा यही विचार व्यक्त करने की कोशिश की... आप सब भी देखिये....


Save trees... Save our Mother Land


तो मित्रों, आप समझ गए न कि यदि हम पेड़ों को काटेंगे तो धरती एक दिन यूँ ही टूट कर बिखर जायेगी... और मेरा यह सन्देश शायद निर्णायक मंडल ने समझ लिया...  तभी तो मुझे इस बार प्रथम पुरस्कार मिला... 


First Prize !!!


इन पुरस्कारों की वजह से मेरा नाम पटना के कई अखबारों में भी प्रकाशित हुआ.....





































तो मित्रों अब पृथ्वी के भविष्य को बदलने के लिए हम सभी को हाथ बंटाना होगा, हमारी धरती को हरा-भरा बनाकर.... तो चलिए हम सब आज संकल्प लें कि हम अपनी प्यारी धरती को नष्ट नहीं होने देंगे और धरती के भविष्य को बदल कर दिखायेंगे... !!! 

Happy World Earth Day to all my Friends !!!!  



Friday, April 20, 2012

मेरा प्यारा ब्लॉग...


हैप्पी बर्थडे टू यू......
हैप्पी बर्थडे टू यू......


अरे! ये किसका बर्थडे है.....?...........


क्या हुआ फ्रेंड्स ?..... 


कन्फ्यूज़ हो गए न !.... कि आज किसका बर्थडे है ?.....


सोचिये.....सोचिये.........


ह्म्म्म्म्.... नहीं बता पाए ना?... अरे भई, आज है.... मेरे प्यारे ब्लॉग का बर्थडे!!!..... आज से ठीक एक साल पहले मेरे ब्लॉग की शुरुआत हुई थी... और आज मेरा ब्लॉग पूरे एक साल का हो गया.... 20 अप्रैल 2011 को इस ब्लॉग की पहली पोस्ट पब्लिश हुई थी... तब वो पोस्ट मेरी माँ ने लिखी थी और आज एक वर्ष बाद 20 अप्रैल 2012 को मैं खुद आप सबसे बातें कर रही हूँ... सच मुझे बहुत ही खुशी हो रही है... आज का दिन मेरे लिए बहुत स्पेशल है क्योंकि..... आज मेरे ब्लॉग यानि उस मंच का जन्मदिन है जिसके माध्यम से मैं अपनी ढेर सारी बातें आप सबसे न सिर्फ़ शेयर कर सकती हूँ... बल्कि जिसके माध्यम से मुझे बहुत कुछ नया जानने और सीखने को भी मिलता है.... 


तो आज अपने इस प्यारे ब्लॉग के लिए मैं कुछ कहना चाहती हूँ.....


              एक साल का हो गया 
              मेरा प्यारा ब्लॉग 
             खुशी मनाओ, जश्न मनाओ
             सारे मिलकर नाचो-गाओ
             था मंगलमय सफ़र हमारा
             अब तक का
             आगे भी ये सुखद रहेगा, 
             कहना है मेरे मन का 
             तो फिर.....
             खुशी मनाओ, जश्न मनाओ
             सारे मिलकर नाचो-गाओ
             क्योंकि......
             एक साल का हो गया 
             मेरा प्यारा ब्लॉग !!!









Monday, April 16, 2012

My on line poetry Teacher....


नमस्कार!
      जैसे स्कूल में मेरे सारे सब्जेक्ट्स के लिए अलग-अलग टीचर्स हैं वैसे ही यहाँ ब्लॉग पर भी मेरे एक बड़े ही अच्छे पोएट्री टीचर बन गए हैं रविकर अंकल.... अंकल कई बार मुझे मैसेज में Fill in the blanks form में कुछ शब्द देते हैं और मैं उनकी सहायता से कविता बनाने की कोशिश करती हूँ.... मैंने अंकल को अपनी ये टेढ़ी-मेढ़ी सी लिखी हुई कविता "प्रेम की भाषा" दिखाई तो रविकर अंकल ने चुटकियों में इसे एकदम राइमिंग बना दिया और अब ये एक बड़ी ही अच्छी सी कविता बन गयी है... देखिये आप भी उस कविता के इस नए रूप को देखिये....

प्रेम की भाषा
यूँ ही बैठे देख रही थी, 
उस खिड़की के बाहर |

मेरी जैसी चंचल चपला,
एक गिलहरी नीम पेड़ पर |

कभी उछलती, कभी कूदती, 
वह चढ़ जाती पेड़ों पर ||

चाहूँ अपना दोस्त बनाना,
गई भाग पर मुझसे डरकर |

मेरी भाषा नहीं समझती,
दूर से देखे घूर-घूर कर |

इतने में ही मेरी मम्मी, 
देखी मुझको खिड़की पर |

समझ गई वह बिना बताये,
जान छिड़कती जो मुझपर |

प्यार की भाषा अच्छी भाषा,
समझे इसको थलचर-नभचर ||

प्यार से उसको पुचकारो तो
आ जायेगी उछल-उछल कर |

काम आ गई माँ की वाणी,
खेल रही मेरी गोदी पर |

गोदी में ही सो जाती है, 
हाथ फेरती जैसे उसपर ||



थैंक्यू  रविकर अंकल! मेरी कविता को और अच्छी बनाने के लिए..... दोस्तों आपको पता है कि आप सब मेरी हर पोस्ट में सहायता करते हैं....पता है कैसे? ...अपने कमेंट्स के द्वारा....है ना?.... इसलिए thanks to all of you!!!







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