Wednesday, March 28, 2012

मार्च स्पेशल.....



हैलो फ्रेंड्स !!!
    
अपने स्कूल के बारे में बातें करते-करते एक बहुत ही ज़रूरी बात तो मैं भूल ही गयी... ये मार्च का महीना है और कुछ ही दिनों पहले हमने खुशियों से भरे रंग-बिरंगे त्यौहार को मनाया है... तो फिर इससे पहले कि ये महीना बीत जाये हम इस त्यौहार की भी कुछ बातें कर लेतें हैं...

   शुरुआत करती हूँ तब से जब मैं एक साल की थी... मम्मी बताती हैं कि जब मैं एक साल की थी तब मैं रंगों से और सबके भूत जैसे चेहरों को देखकर बिलकुल भी नहीं डरी थी और खूब होली खेली थी....  

देखिये रंग लगाकर भी मैं कितनी खुश हूँ!


लेकिन उसके बाद वाली होली पर मैं बहुत डर गयी थी और जैसे ही कोई किसी को रंग लगाने जाता मैं रोने लगती... और फिर सब मुझे बहलाने लगते... देखिये यहाँ भी पापा और राजन मामा मुझे हंसाने की कोशिश कर रहे हैं....


पिचकारी तो हाथ में है लेकिन
रंग नहीं खेलना 


कितनी बुद्धू थी ना तब मैं...:) लेकिन जब मैं बड़ी हो गयी और थोड़ी समझदार हो गयी तब तो मैंने खूब इंज्यौय किया... और क्यों न करती अब मैं दीदी जो बन गयी थी... 

अरे! भूत दीदी से भाई तो बिलकुल भी नहीं डरा
ह्म्म्म्म्म् भाई तो और भी निडर निकला !!!


और उसके बाद वाली होली तो और भी मज़ेदार थी क्योंकि इस बार तो पटना में मेरे ढेर सारे फ्रेंड्स भी थे मेरे साथ मस्ती करने के लिए....

मुझे पहचाना!...बताइए इनमें से मैं कौन सी हूँ?


लेकिन सबसे ज़ोरदार होली तो तब हुई थी जब हम बनारस में थे वहाँ तो हमने इतने सारे रंग एक-दूसरे को लगाये थे कि सारे लोग काले भूत बन गए थे....


मैं और अनिकेत  
हमारी मस्ती....




काले-काले भूत!!!!!!!!


पिछले साल होली पर मैं गाँधीधाम आ चुकी थी और यहाँ एक भी दोस्त नहीं था, मैं बहुत दुखी थी लेकिन तभी अचानक होली के एकदम पहले दादू और नेहा दीदी आ गए फिर तो मज़ा आ गया हमने खूब मस्ती की... एक दिन पहले हम सब होलिका दहन देखने गए... मुझे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि यहाँ की होलिका Eco-friendly होती है.....









गोबर के उपलों से तैयार की गयी होलिका के चारो तरफ़ सुन्दर सी रंगोली बनायी जाती है.


और फिर सब लोग इकठ्ठे होकर उसके चारों ओर परिक्रमा करते हुए पूजा करते हैं और होलिका में आग लगाते यानि होलिका-दहन करते हैं.... 


और फिर अगली सुबह तो धमाल ही धमाल... लेकिन हाँ पिछले साल यहाँ थोड़ी ठंड थी और नेहा दीदी को बुखार भी था तो हमने सूखी होली यानि गुलाल के साथ ही ज़्यादा मस्ती की थी... इसलिए इसबार हम सब काले भूत नहीं बल्कि चलते-फिरते इन्द्रधनुष बन गए थे... 


ये देखिये ये हैं हम... होली के रंग में रंगे हुए..:) 

कितना सुन्दर मेकअप है ना....:)

और ये रही इस साल यानि 2012 की होली.... सुबह-सुबह भगवान के चरणों में गुलाल अर्पित करके, बड़ों को प्रणाम करके, रंग, अबीर-गुलाल लेके पूरी तैयारी के साथ हम निकले पड़े....   


हम हैं तैयार... रंग-गुलाल और पिचकारी के साथ!!!  


इस बार कैम्पस में कुछ ही दिन पहले आए मेरे नए दोस्तों के साथ मैंने खूब मस्ती की.... कभी हम रंगीन पानी से तरबतर हो जाते तो कभी रंगबिरंगे अबीर-गुलाल से सबके चहरे इन्द्रधनुष जैसे खिल जाते... हमारा पूरा कैम्पस रंगबिरंगा हो गया था...


आज ना छोड़ेंगे......








और हाँ अपने सबसे प्यारे दोस्त यानि पेड़ -पौधों के साथ भी मैं होली खेलना नहीं भूली... पिचकारी की धार में नहाकर देखिये ये सब भी खिल उठे..... 


सरररररर!!!!!!!!!!!!!........ होली है!!!!!!!


तो ये थी हमारी होली की मस्ती.... इसके बाद नहा-धो कर, साफ-सुथरे होकर हमने नए-नए कपड़े पहने... और तब तक भूख बहुत ज़ोरों से लग चुकी थी, तरह-तरह के पकवानों की खुशबू से हमारे मुँह में पानी आ रहा था... बस फिर क्या था.... हम सब खाने पर टूट पड़े.... अरे-अरे आप निराश मत होइए आपके लिए भी मैं कुछ बचाके लायी हूँ..... ये देखिये.......

ये हैं गांधीधाम की होली स्पेशल जलेबियाँ !!!!!

जी हाँ यहाँ होली पर गुझिया नहीं बल्कि जगह-जगह ये स्पेशल जलेबियाँ खूब मिलती हैं... होली के एक हफ्ते पहले से ही जगह-जगह दुकाने सज जाती हैं... बड़े-बड़े कड़ाहे चढ़ जाते हैं और ये गर्मागर्म जलेबियाँ (जिसे यहाँ घेवर कहते हैं) बिकनी शुरू हो जाती हैं...  
   
अरे लीजिए-लीजिए आप भी खा के देखिये बड़ी स्वादिष्ट हैं ये जलेबियाँ... तो आप इनके स्वाद का मज़ा लीजिए मैं तो अब बहुत थक गयी हूँ इसलिए अभी चलती हूँ थोड़ा आराम करके फिर आऊँगी... तब-तक के लिए.....बाय!!!!!!!!





Monday, March 26, 2012

मेरा स्कूल....



आइये आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल से करवाती हूँ...


ये है मेरा स्कूल 

मेरा स्कूल यानि दिल्ली पब्लिक स्कूल (गाँधीधाम), एक ऐसी जगह जहाँ मैं हमेशा रहना चाहती हूँ.... मेरे स्कूल की स्थापना १९ जून, २००६ में हुई गयी थी| यहाँ, ३ फ्लोर्स हैं- ग्राउंड, फर्स्ट और सेकंड... गाँधीधाम भूकंप ज़ोन में आता है इसलिए हमारे स्कूल की सारी बिल्डिंग्स सर्कुलर शेप में हैं और ऊपर जाने के लिए सीढियाँ नहीं बल्कि स्लाइडर्स हैं.... यहाँ पर कम्पयूटर लैब, म्यूज़िक-डांस रूम, आर्ट रूम, स्पोर्ट्स रूम, लाइब्रेरी, स्केटिंग रिंक, बास्केटबॉल कोर्ट, स्पोर्ट्स फ़ील्ड, रंगबिरंगे झूलों से भरा प्लेग्राउंड, कैंटीन आदि सभी कुछ हैं.... यहाँ पर ईवनिंग एक्टिविटीज़ भी होतीं हैं.... जब कभी स्कूल में कुछ ज्यादा होम-वर्क मिल जाता है तो हम सब स्कूल को बोरिंग मानते हैं लेकिन अगले ही पल मैं स्कूल जाने के नाम से उछल-कूद के तैयार हो जाती हूँ.... एक पल गिर के चोट लगने पर स्कूल को ज़िम्मेदार मानती तो अगले ही पल नर्स मैम से दवाई लग जाने के बाद स्कूल को थैंक्यू कहती हूँ...  टीचर्स से डांट पड़ने पर बहुत दुःख होता है लेकिन अगले पल टीचर्स से प्रशंसा सुनकर वही सबसे अच्छी टीचर लगने लगती हैं.......चाहे मैं अपने स्कूल से कितना भी गुस्सा क्यों ना हो लूँ पर यह मेरी  फेवरेट जगह ही रहेगी.......



हमारा प्लेग्राउंड 

मैंने अपने इस स्कूल में एडमिशन 7 दिसंबर 2010 को लिया था और फिर 8 दिसंबर से अपने नए स्कूल में जाना शुरू कर दिया... शुरुआत में तो कुछ दिन मुझे यहाँ अच्छा नहीं लगा लेकिन धीरे-धीरे मुझे अपने इस स्कूल से भी प्यार हो गया... आपको सच बताऊँ...जब अपने पुराने स्कूल से शिफ्ट होकर मैं इस स्कूल में आई थी तब मुझे बिलकुल नहीं लगा था कि ये स्कूल मेरा फेवरेट बन जायेगा लेकिन अब.... अब तो मैं कहूँगी...."My School Rocks"  



ये है सी-विंग  जो उस समय निर्माणाधीन था लेकिन
अब पूरा बन चुका है


ह्म्म्म!!! ये तो मैं हूँ ऑफिस के सामने...:)


वो दूऊऊर मेरे पीछे रंग-बिरंगा कुछ दिख रहा है ?
जी हाँ! वो हैं हमारे रंग-बिरंगे, प्यारे-प्यारे झूले


और ये है इन्ट्रेन्स पैसेज...


ये सारी फोटो तो उस दिन की है जब मैं इस नए स्कूल में एडमीशन के लिए पहली बार आई थी... अभी तो बहुत-बहुत कुछ है मेरे पास अपने स्कूल के बारे में बताने के लिए लेकिन अब आज इतना ही... और ढेर सारी बातें बाद में बताऊँगी... बाय...



Saturday, March 24, 2012

रिपोर्ट कार्ड डे....

हेलो फ्रेंड्स! I am back......
    आज मैं आप सब से अपने आज हुए रिपोर्ट कार्ड डे के बारे में बात करूँगी। 
       लेकिन उससे पहले आप सभी को "चेटी चंड" की हार्दिक शुभकामनाएं। लेकिन एक मिनट रुकिए, क्या आपको  "चेटी चंड"  के बारे में पता नहीं है? hmmmmm...... तभी तो मैं सोचूँ कि आप सबके चहरे पर अज्ञानता क्यों छाई हुई है?...........रिपोर्ट कार्ड डे के बारे में बात करने से पहले थोड़ा  "चेटी चंड"  के बारे में भी जान लेते हैं............ तो चलिए देर किस बात की ?

     "चेटी चंड" सिंधियों का नव वर्ष है| सिंधी मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था जो वरुण देव के अवतार थे| यह एक उत्सव से शुरू होता है, जो चैत्र शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है| यहाँ गांधीधाम में SRC यानि सिंधी कम्यूनिटी की पापुलेशन बहुत ज़्यादा है इसलिए यहाँ पर ये पर्व बहुत ही अच्छे से मनाया जाता है | पूरे शहर की सारी सड़कों को दीवाली की तरह रंगीन बिजली के बल्बों वाली झालरों से सजाया गया है, जो बहुत ही सुन्दर लगता है | 

       Hmmmmm, आप अब तो समझ ही गए होंगे कि क्या है चेटी चंड | और हाँ; याद रखियेगा, भूलिएगा नहीं| समझ गए......तो चलिए अब बात करें मेरे रिपोर्ट कार्ड डे की|

     आज यानी २४ मार्च, २०१२ को मेरा रिपोर्ट कार्ड डे था| मेरी अध्यापिका ने मेरी काफी तारीफ की| और क्यों ना करतीं आखिर मैंने काफी अच्छा रिज़ल्ट जो किया था | हाँ, Music & Dance और Games में मेरे ग्रेड्स कम अच्छे हैं..:(... लेकिन कोई बात नहीं मैं थोड़ी और कोशिश और परिश्रम से  उन्हें  NO.1 यानी A+ बना दूंगी...:).. मेरी अध्यापिका तथा मेरी माँ ने मुझे और अधिक परिश्रम करने की सलाह दी क्योंकि मुझे सिर्फ क्लास में 1st  नहीं आना है, बल्कि एक अच्छा इंसान बनना है जिसे हर कोई पसंद करे|

     अरे! मैंने आपको अपने नए class-section के बारे में तो बताया ही नहीं| चलिए कोई बात नहीं मैं अभी ही बता देती हूँ| मेरा क्लास है- 5th हिमालयाज़ (HIMALAYAS)!.... आप सब चौंक  गए ना कि A, B , C, D कि जगह ये पर्वत का नाम कहाँ से आ गया?.... मेरी तरह मेरा स्कूल भी अनोखा है और इसीलिये मेरे स्कूल के विभिन्न क्लासेज अलग-अलग चीज़ों के नाम पर आधारित हैं जैसे प्रथम क्लास के सेक्शंस हैं- जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, गगन; द्वितीय क्लास के सेक्शंस कीमती पत्थरों के नाम पर आधारित हैं...  और इसी तरह कक्षा पाँच के  सेक्शंस पर्वतों पर आधारित है जैसे -अरावली, एल्प्स, हिमालयाज़ और सतपुड़ा...|मेरी टीचर्स कौन-कौन सी होंगी ये अभी मुझे पता नहीं चल पाया है..... एक दुख की बात ये है कि मेरे सारे फ्रेंड्स अलग-अलग सेक्शंस में बट गए हैं....:(..... लेकिन कोई बात नहीं, धीरे-धीरे मैं फिर से नए दोस्त बना लूँगी |

      अपने अंदर ज्ञान का भण्डार समेटे हुए मेरी सारी नयी पुस्तकें बहुत ही रोचक, रंग-बिरंगी तथा मनोरंजक हैं| कुछ ही दिनों बाद मैं स्कूल जाऊँगी और पहली बार पेन से अपनी नयी कॉपियों पर सुन्दर-सुन्दर हैंड राइटिंग में लिखूँगी... और सबसे विशेष बात तो यह है कि मेरा प्यारा भाई शाश्वत भी अब मेरे साथ ही स्कूल जाएगा और आएगा.... अब तक वो सिर्फ स्कूल जाते समय तक ही मेरे साथ रहता था, पर अब डबल धमाल!!!!! 
       अब तो बस मुझे जल्दी से स्कूल खुलने का इंतज़ार है  लेकिन अभी थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा क्योंकि इंतज़ार का फल मीठा होता है | और फिर मैं... आप सबकी रुनझुन यानि प्रांजलि दीप क्लास 5 में होऊँगी.....नई किताबों की खुशबू, नया बैग, नया क्लास, नई टीचर्स, नए दोस्त, सब कुछ नया-नया.... आहा!!!!! 
       मेरे इस नए सफर में मुझे आप सब का ढेरों आशीर्वाद चाहिए ताकि मैं  Junior prefectorial Body की हेड गर्ल बन सकूँ और प्रगति के नए  सोपान तय कर सकूँ... बस आज के लिए इतना ही कल मैं फिर आऊंगी नयी बातें लेकर ....बाय फ्रेंड्स...!!!!!! 


Friday, March 23, 2012

नए वर्ष का पहला दिन, पहली पोस्ट और मैं कैद हो गई...



Hello ! 
        मैं हूँ आप सबकी रुनझुन! 




     आज मैं खुद आपसे बातें करना चाहती हूँ, क्योंकि अब तो मैं पूरे दस साल की हो गई हूँ और अपनी बातें खुद कर सकती हूँ |

     मेरी फेवरेट हॉबी है आर्ट एंड क्राफ्ट और ढेर सारी कहानियाँ पढ़ना... | अब तक मैं सिर्फ डायरी लिखती थी और कभी-कभी छोटी-छोटी कहानियाँ भी लेकिन अब मैंने धीरे-धीरे ब्लॉग लिखना भी सीख लिया है... मेरी कक्षा चार की परीक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं और फिलहाल छुट्टियाँ चल रही हैं इसलिए आज-कल  मेरे पास बहुत सा समय होता है जिसमें मैं कुछ नया करना और सीखना चाहती हूँ... और अब अपने इस ब्लॉग के माध्यम से मैं आप सबसे ढेरों बातें कर सकती हूँ ... बस आप मेरी अच्छाइयों, बुराइयों  और मेरी गलतियों के बारे में मुझे बताते रहियेगा... क्यों ठीक है न?....
       
      मेरा क्लास 4 का रिज़ल्ट कल यानि 24 मार्च को आएगा...  पता नहीं क्या होगा (हालाँकि मुझे विश्वास है कि अच्छा ही होगा)... क्लास 3 का रिज़ल्ट तो बहुत अच्छा था... सारे सब्जेक्ट में highest marks और क्लास में फर्स्ट आई थी और पिछले साल 6th अप्रैल को मुझे Acadmic Awards  भी मिले, मम्मी, पापा, मैं और घर के सभी लोग मेरे रिज़ल्ट से काफी खुश थे... लेकिन हमारी टीचर और मम्मी कहती हैं... सिर्फ क्लास में फर्स्ट आना ही काफी नहीं होता बल्कि हर फ़ील्ड में अच्छी जानकारी होना, Strong vocabulary, Strong G K होना और सबसे बढ़कर एक अच्छा इन्सान होना सबसे  ज़रूरी है, इसलिए हमें रोज़ अख़बार ज़रूर पढ़ना चाहिए... इसलिए अब मैं रोज़ अख़बार पढने की आदत डालने की कोशिश भी कर रही हूँ.... "The Times of India" का सन्डे स्पेशल "The Speaking Tree" मुझे बहुत पसंद है...
     
     अरे...अरे मैं तो बस अपने बारे में ही बोलती जा रही हूँ... आप सब को नव संवत्सर की बधाई तो मैंने दी ही नहीं... आज हमारा राष्ट्रीय नव-वर्ष है...आज से नया संवत शुरू हो रहा है... वासंतिक नवरात्रि का पहला दिन, गुडीपडवा, उगादी आदि कई नामों से भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मनाये जाने वाले इस पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ.... 
      
      मैं बहुत खुश हूँ कि आज के इस विशिष्ट दिन मैं ये नई शुरुआत कर रही हूँ... मैं सुबह-सुबह ही अपनी शुभकामना आप सबको देना चाहती थी लेकिन मुझे कुछ देर हो गई क्योकि मैं आज कुछ देर के लिए "कैद" हो गई थी..... अरे नहीं नहीं चौकिये नहीं... जेल में नहीं, अपने बाथरूम में... मैं सुबह- सुबह बाथरूम में गई और जब बाहर निकलना चाहा तो दरवाजा खुला ही नहीं ... सबकी कोशिशें बेकार... और मैं लगभग एक घंटे तक बाथरूम में कैद रही उसके बाद कारपेंटर ने आकर आटोमैटिक लॉक तोड़ दिया तब जाकर मैं बाहर निकल पाई... और इस चक्कर में मेरी सुबह ही देर से शुरू हो पाई... फिर जब मैं लिखने बैठी तो बिजली गुल हो गई... यानि सिर मुड़ाते ही ढेर सारे ओले पड़ गए... हा-हा-हा.... लेकिन अब सब ठीक है.... मौसम बिलकुल साफ है... अब मैं चलती हूँ कुछ और काम करने कल आप सबसे फिर मिलूँगी... तब तक के लिए... बाय.....!!!!!


एक पहल...



       रुनझुन की बातों का सिलसिला बस यूँ ही शुरू हो गया था... बहुत कुछ था जो संजोना चाहती थी... अपनी लाडली को, उसके बचपन की ढेरों मीठी यादों... भोली बातों से सजा एक गुलदस्ता भेंट करना चाहती थी... लेकिन ये सब कैसे और कब करूँगी खुद भी नहीं जानती थी... बस यूँ ही एक दिन मेरी अभिन्न मित्र प्रतिमा का एक ब्लॉग देखा पंखुरी टाइम्स और जाने कहाँ से ये एक खयाल चुपचाप मेरे अंदर आकर बैठ गया कि शायद यही वो जगह है जहाँ मैं सबसे ख़ूबसूरत ढंग से अपनी नन्ही की बातों को सहेज सकती हूँ... ये ख्याल बस ख्याल ही रह जाता अगर एक दिन प्रतिमा ने (जो हमेशा ही मेरा अंतर्मन पढ़ लेती हैं) मेरे मन की बात अपने मुँह से न कह दी होती... उन्हीं की हौसला आफ़जाई और पहल के फलस्वरूप ये ब्लॉग अस्तित्व में आया... और वो सारी बातें... उसके मासूम बचपन की वो सारी यादें... जो मुझे सौंपना था अपनी बेटी को... काफी हद तक मैंने यहाँ इकट्ठी कर दी... इस दौरान कई बार कई तरह की मनःस्थितियों से भी गुजरी... कभी तो बड़े ही मनोयोग से उसकी बातें लिखती और सबके कमेंट्स पढ़ कर खुश भी होती लेकिन फिर कई बार ये भी लगता कि मैं यहाँ ये सब क्यों लिखती हूँ... मेरी नितांत निजी भावनाओं से किसी को क्या लेना-देना... मेरी तरह लगभग हर माँ अपने बच्चे के साथ ऐसे ही पलों को जीती और महसूसती है तो फिर मेरे साथ नया क्या है जो मैं यहाँ लिखती रहती हूँ... लेकिन फिर अगले ही पल खुद को ही समझाती कि ये सब तो मैं अपनी बेटी से उसका बचपन साझा कर रही हूँ तो फिर औरों की सोच परेशान क्यों होती हूँ... तब एक विचार यह भी आता कि फिर इस ब्लॉग को सार्वजनिक करने और उसपर लोगों की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार मुझे क्यों रहता है... ऐसे में फिर प्रतिमा दी ही मेरा हौसला बढ़ाती- 'तुम कुछ मत सोचो बस लिखती जाओ' और मैं फिर से लिखने को कटिबद्ध हो जाती.... इस तरह ढेरों सकारात्मक-नकारात्मक विचारों... अनियमितताओं के बीच भी अगर लिखना जारी रहा तो इसकी सबसे बड़ी वजह मेरी रूहानी शक्ति प्रतिमा के द्वारा की गई हौसला आफ़जाई, मेरे अपनों की खुशी और आप सब ब्लॉगर दोस्तों का साथ ही था... जिन्होंने हमेशा अपने सार्थक कमेंट्स के द्वारा मुझे ये एहसास कराये रखा कि मेरा लिखना निरर्थक नहीं है| 

     हाँ, इन सबका एक सबसे ज़्यादा सकारात्मक प्रभाव ये रहा कि मेरी बेटी ने अन्य ब्लॉगों को पढ़ने और उनपर अपने छोटे-छोटे कमेंट्स देने के साथ ही कुछ ब्लॉगर दोस्त भी बना लिए और वो अब खुद भी लिखने में रूचि लेने लगी है जो मैं हमेशा से चाहती थी (क्योंकि मेरी बेटी बहुत ही अंतर्मुखी है... अपने मन की बात जल्दी किसी से न कहना... अपने आंसू... अपनी तक़लीफें अंदर ही अंदर पी जाना, न जाने कैसे उसने बचपन से ही सीख लिया है... ऐसे में मेरा मानना है कि लेखन उसे हमेशा खुद को संभालने में काफी मददगार साबित होगा)... इसलिए अब ये प्लेटफॉर्म मैं उसे सौंप रही हूँ... ताकि अब वो यहाँ अपने रंग खुद सजा सके... अपनी बातें खुद कर सके... 
      
     आप सबका साथ, प्यार और आशीर्वाद उसके साथ हमेशा बना रहे... उसकी कच्ची लेखनी को आपका सच्चा मार्गदर्शन मिलता रहे... बस इसी मंगल कामना और शुभेच्छा के साथ आज "चैत्र शुक्ल प्रतिपदा" के दिन ये ब्लॉग एक नए आगाज़ की ओर बढ़ रहा है....  


तो बस थोड़ा सा इंतज़ार.... अगली पोस्ट में रुनझुन खुद आपसे बातें करेगी.... 


इति शुभम!


    

Friday, March 2, 2012

हैलो! पटना !!!



सितम्बर २००५ में रुनझुन मुज़फ्फरपुर को अलविदा कह, बिहार की राजधानी पटना आ गयी.... नया शहर... नए लोग... नया स्कूल... सब कुछ नया-नया.... शुरू में कुछ दिन तो रुनझुन को इस नए शहर में बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा... उसे अपने पुराने घर और वहाँ के लोगों की बहुत याद आती थी... इसलिए वो कुछ उदास रहने लगी... बस, भाई के साथ खेलकर ही उसे कुछ अच्छा लगता...   

नए घर में उदास बैठी बेटी 

यूँ तो सबसे अच्छा, सबसे सच्चा, प्यारा दोस्त
साथ था...  

लेकिन पिछली यादें साथ ही न छोड़ती...

जब कई दिनों तक रुनझुन की ये उदासी खत्म ना हुई तो फिर मम्मी-पापा  उसे पटना का चिड़ियाघर (Zoological and Botanical Garden) जिसे संजय गाँधी जैविक उद्यान भी कहते हैं, दिखाने ले गए... वहाँ जाकर रुनझुन को लगा जैसे वो किसी दूसरी ही दुनिया में आ गयी है... वहाँ रुनझुन के सबसे प्यारे दोस्त यानि ढेर सारे पेड़-पौधे तो थे ही साथ ही  इतने सारे छोटे-बड़े जानवर, तरह-तरह के पक्षी..... शेर, भालू, चीता, जेब्रा, दरियाई घोड़ा, मगर, घड़ियाल, हिरन, बारहसिंगा, हेमू, खरगोश, बन्दर, लंगूर, मोर, तोता, सारस, बगुला....... और...और.....और भी बहुत सारे पशु-पक्षी जिन्हें वो अपनी रंग-बिरंगे चित्रों वाली किताब में या फिर कभी-कभी टेलीविजन पर देखा करती थी.... आज उन सबको इतने पास अपनी आँखों से चलते-फिरते, उछलते-कूदते देख कर उसके आश्चर्य का ठिकाना न था... बस फिर क्या था थोड़ी ही देर में रुनझुन का मूड फ्रेश हो गया... 








Beautiful white Tiger 


कुछ दिखा ?...नहीं ?.... अरे ! ज़रा ध्यान से देखिये ..
वो रुनझुन के पीछे कोने में टाइगर दुबक के बैठा है..
शायद रुनझुन से डर गया!!!!!...ही-ही-ही!!!!


तभी घूमते-घूमते अचानक रुनझुन चौंक पड़ी!!!! 

अरेsss!! इत्तीsss बड़ी मछली????.... 

लेकिन तब मम्मी ने बताया कि ये Fish Aquqrium है, इसके अंदर तरह-तरह की रंग-बिरंगी मछलियाँ देखने को मिलेंगी.... ये Aquarium एक बड़ी सी मछली के आकार का था... 


ये रहा Aquarium का आगे का भाग...  


और ये उसका बाकी हिस्सा 


अंदर बहुत सुन्दर-सुन्दर छोटी-बड़ी मछलियाँ थी, उनकी फोटो तो नहीं खीच सके लेकिन उन्हें देखकर रुनझुन बहुत खुश हुई...और क्यों न हो इससे पहले उसने अपनी किताबों में मछलियों के चित्र भर ही देखे थे...यूँ रंगबिरंगी मछलियों को चलते-फिरते-तैरते देखकर रुनझुन ख़ुशी से उछल पड़ी....
चिड़ियाघर में पशु-पक्षी, हाथी की सवारी, टॉय ट्रेन के अलावा एक और अनोखी चीज़ थी जो रुनझुन के लिए बड़ी ही कौतूहल भरी थी... बता सकते हैं क्या ???......
                      गौर से देखिये तो ज़रा.....................


आप पहचान गए न!.... लेकिन रुनझुन नहीं समझ पा रही थी कि ये कुछ-कुछ ट्रेन जैसी दिखने वाली क्या चीज़ है.... वो झट से उसमें चढ़ गयी... बाद में उसे पता चला कि ये भाप से चलने वाला इंजन है, बहुत साल पहले ट्रेन ऐसे ही इंजनों द्वारा चलती थी... रुनझुन हैरान.... झटपट उसने अंदर जाकर इधर-उधर देखा लेकिन.......

उसकी कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर ये चलता कैसे है 

ना! ये तो चलता ही नहीं बस एक जगह खड़ा है!!!


और अंततः कुछ-कुछ समझते... कुछ-कुछ न समझते हुए रुनझुन इंजन में से उतर गई... ये इंजन तो चला नहीं.. लेकिन कोई बात नहीं टॉय ट्रेन ने तो उसे पूरा चिड़ियाघर घुमा ही दिया था..... रुनझुन खुशी-खुशी घर की ओर चल दी....... हाँ, घर जाते समय अब वो अपने इस नए शहर से भी बहुत-बहुत खुश थी... इस नए शहर में बहुत अच्छी-अच्छी चीजें उसे देखने को मिली.... हाँ, अब उसे अपना ये नया शहर भी अच्छा लगने लगा था...। 




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